बेटी का अपनापन

बेटी का अपनापन | Love for Daughters Story in Hindi

आज office में बहुत थक गया था और वह जैसे ही अपने घर के अंदर घुसा, एक प्यारी सी आवाज आयी |

love of daughter story in hindi
Image credits- Google Images    Post - Love for Daughters Story in Hindi
International Woman day 


"पापा मैंने आपके लिए हलवा बनाया है"

ये आवाज थी उसकी 11 साल की प्यारी सी बेटी की।

पिता office की सारी थकान भूल कर बोला "ooohho.... क्या बात है! ,ला कर खिलाओ फिर अपने पापा को,"
बेटी दौड़ती kitchen मे गई और बडा bowl भरकर हलवा लेकर आई .. पिता ने खाना शुरू किया और बेटी को देखा .. पिता की आँखों मे आँसू थे...

क्या हुआ पापा हलवा अच्छा नही लगा ?

पिता- नही मेरी बेटी बहुत अच्छा बना है, और देखते देखते पूरा Bowl खाली कर दिया; इतने मे माँ बाथरूम से नहाकर बाहर आई,
और बोली- "ला मुझे भी खिला तेरा हलवा"

पिता ने बेटी को 50 रु इनाम मे दिए , अब बेटी और भी ज्यादा खुशी से मम्मी के लिए kitchen से हलवा लेकर आई मगर ये क्या जैसे ही उसने हलवा की पहली चम्मच मुंह मे डाली तो तुरंत थूक दिया और बोली- "ये क्या बनाया है, ये कोई हलवा है, इसमें तो चीनी नही नमक भरा है , और अपने पति की तरफ तीखी नज़रो से कहा, आप इसे कैसे खा गये ये तो जहर हैं , मेरे बनाये खाने मे तो कभी नमक- मिर्च कम है, तेज है कहते रहते हो और  बेटी को बजाय कुछ कहने के इनाम देते हो...."

पिता-(हंसते हुए)- "पगली तेरा मेरा तो जीवन भर का साथ है, रिश्ता है पति पत्नी का जिसमें नौक-झौक रूठना मनाना सब चलता है; मगर ये तो बेटी है कल चली जाएगी, मगर आज इसे वो एहसास, वो अपनापन महसूस हुआ जो मुझे इसके जन्म के समय हुआ था। आज इसने बडे प्यार से पहली बार मेरे लिए कुछ बनाया है, फिर वो जैसा भी हो मेरे लिए सबसे बेहतर और सबसे स्वादिष्ट है; ये बेटियां अपने पापा की परियां , और राजकुमारी होती है जैसे तुम अपने पापा की हो..."

वो रोते हुए पति के सीने से लग गई।

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एक बेटी जिसको आज मायके वाले कहते है कि यह दूसरे घर की अमानत हैं और ससुराल वाले कहते हैं ये दूसरे घर से आयी हैं। वह इसी असमजंस में रहती हैं कि किसे अपना समझे और किन्हें अपने....
इन बातो के बावजूद भी वह जहाँ रहती हैं उसे ही अपना घर समझती हैं और उस घर के लोगो को अपनाती हैं। तो फिर उस घर के लोगो का भी फ़र्ज़ बनता हैं की उसे वो अपनापन दे जिसकी वो हकदार हैं।....

सिर्फ बेटी बचाओ...बेटी पढ़ाओ स्लोगन से काम नहीं चलने वाला अगर हम उन्हें उनका हक, उनका प्यार, उनका सम्मान नहीं दे पा रहे तो।

क्यों हम लोगो के दिल में महिलाओ की प्रति ऐसी सोच बना रहे हैं की वह कमजोर हैं। जबकि हमे उनके परचम की बात करनी चाहिए जो उन्होंने सारे विश्व में फैलाया हैं। आज से नही प्राचीन काल से।




लेख पढ़ने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद् ||










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बेटी का अपनापन बेटी का अपनापन Reviewed by Anshul Gupta on 3/25/2020 Rating: 5

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